Tuesday, September 17, 2013

तुम्हें क्या ...



मैं एक गंवार था
दुनिया के
तोर - तरीके का चलन
मुझे नहीं आता था
मुझे तो ये भी नहीं पता था
की मैं क्या हूँ ...?

फिर
एक दिन यूँ ही
मुझे तू मिल गई
तुमने मुझको देखा समझा
और अपना बहुत सारा स्नेह दिया
शायद तुमने मुझमें छुपे
सादगी को जो देख लिया था मुझसे मिलकर,
वक़्त और आगे बढ़ा
धीरे- धीरे हम रोज
मिलने लगे
फिर क्या था
तेरा साथ और स्नेह पा के
मैं बहुत जल्दी ही बदल गया
एक सभ्य और सुलझा हुआ इंसान
बन गया,

पर
यूँ रोज मिलते मिलते
मुझे तुझसे प्रेम हो चला था
और मेरे अंदर हुए बदलाव के लिए
मैं तुझे कुछ तोहफा देना चाहता था
जिसे तूने लेने से इनकार कर दिया था
ये कह कर दोस्ती में
ऐसा नहीं होता है
ये सुन मैं बेहद खुश हुआ

फिर क्या था
मैंने एक रोज हिम्मत करके
तुझे आखिर बोल ही डाला
की .. मैं तुम्हें प्रेम करने लगा हूँ
जिसे सुन तुम सबसे पहली हंसी
फिर बोली
तुम बहुत देर कर दिए हो
मैं किसी और की हो चूँकि हूँ
उस समय मैं शब्दवान होके
भी निःशब्द हो गया
तेर बात सुन
जैसे मानो आसमान की सारी बिजलियाँ
मुझपे गिड़ आई हो
लेकिन खुद को संभाल कर
अगले क्षण मैंने तुझसे
हँस के झूठ बोल डाला
अरे ये तो मैं मजाक कर रहा था तुमसे
शायद फिर तुम्हें मेरी ये बात सुन
राहत मिली ..

पर सत्य तो यही था
मैं तुझसे प्रेम करने लगा था
तेरा मेरे प्रेम को यूँ ठुकराना
मुझे फिर से
जैसे वहीँ लाके खड़ा कर दिया था
जहाँ से मैं चला था
एक गंवार बनके ..
और आज तुमको न पाके
दिल के हाँथों फिर से गंवार बन गया

खैर छोड़ो .. तुम्हें क्या .

6 comments:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।

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    1. रविकर जी आपने इस रचना को चर्चा मंच पर जगह देके मुझे अनुग्रीहित किया .. आपका बहुत बहुत आभार !!

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  2. Replies
    1. कालीपद जी तहेदिल से आभार आपका भी .. स्नेह बनाये रखे !!

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  3. Replies
    1. कालीपद जी तहेदिल से आभार आपका भी .. स्नेह बनाये रखे !!

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